जेनेरिक दवाएं (Generic medicines): केंद्र सरकार सस्ती दवाओं को बढ़ावा दे रही है
जेनेरिक दवाओं को अधिक आकर्षक और पहचान योग्य बनाने के प्रयास में केंद्र सरकार उपभोक्ताओं के बीच इनकी पहचान बढ़ाने के लिए नई विपणन रणनीति लाने की तैयारी कर रही है।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की नई योजना के अनुसार जेनेरिक दवाओं को रंग के आधार पर अलग पहचान दी जाएगी, ताकि वे महंगी ब्रांडेड दवाओं से अलग नजर आ सकें। इसका उद्देश्य उपभोक्ताओं को यह समझने में मदद देना है कि दवा खरीदते समय ब्रांडेड या जेनेरिक में से कौन सा विकल्प चुनना है। साथ ही जेनेरिक दवाओं पर विशेष चिन्ह लगाने का प्रस्ताव भी रखा गया है।
ये कदम भारत में भारत में जेनेरिक दवाएं की बिक्री बढ़ाने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा पहले से उठाए गए कई प्रयासों के बाद सामने आए हैं। भारत को लंबे समय से “विकासशील देशों की फार्मेसी” माना जाता रहा है, क्योंकि यहां से बड़ी मात्रा में जेनेरिक दवाओं का निर्यात होता है। हालांकि, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और कड़े नियमों के कारण इस पहचान को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।
इसके बावजूद भारत में दवा उद्योग का बड़ा हिस्सा आज भी जेनेरिक दवाओं पर आधारित है। वर्ष 2017 में फार्मा क्षेत्र की लगभग सत्तर प्रतिशत आय जेनेरिक दवाओं से हुई थी। यह न केवल वैश्विक स्तर पर निर्यात के प्रयासों को दर्शाता है, बल्कि देश के भीतर इनके उपयोग को बढ़ाने की दिशा में भी संकेत देता है।
हाल के वर्षों में जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता और उपयोग बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार ने कई प्रस्ताव पेश किए हैं। एक प्रस्ताव के तहत डॉक्टरों को यह कानूनी रूप से अनिवार्य करने की बात की गई थी कि जहां संभव हो, वे ब्रांड नाम के बजाय दवा का वास्तविक नाम लिखें और जेनेरिक विकल्प उपलब्ध कराएं। इस प्रस्ताव पर दवा कंपनियों, दवा विक्रेताओं और डॉक्टरों के बीच अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं।
राज्य और केंद्र स्तर पर ऐसी सरकारी दवा दुकानों की स्थापना भी की गई है, जहां केवल जेनेरिक दवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बढ़ाने वाली योजनाओं, विशेष रूप से आयुष्मान भारत और प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना केंद्र के अंतर्गत यह पहल और अधिक प्रमुख हुई है।
प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि योजना के तहत जन औषधि केंद्र नामक विशेष स्टोर स्थापित किए गए हैं, जहां केवल जेनेरिक दवाएं बेची जाती हैं। वर्तमान में देशभर में तीन हजार से अधिक ऐसे केंद्र संचालित हो रहे हैं। आयुष्मान भारत के साथ इन पहलों को जेनेरिक उद्योग को मजबूत करने और बिक्री बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
जेनेरिक दवाओं को अधिक सुलभ और किफायती बनाना स्वास्थ्य खर्च को कम करने में सहायक हो सकता है। हालांकि, भारत का जेनेरिक दवा उद्योग के सामने मौजूद विभिन्न चुनौतियां, विशेषकर अंतरराष्ट्रीय बाजार से जुड़ी, पूरी तरह समाप्त नहीं होंगी। फिर भी यह स्पष्ट है कि वर्तमान समय में भारत का जेनेरिक दवा उद्योग एक मजबूत और प्रभावशाली स्थान बनाए हुए है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
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